Sunday, 24 April 2016

केदारनाथ की दुखद यात्रा



आज जब हुआ सवेरा
मेरे मन को प्रसन्ता ने घेरा,
जाना था उतराखंड हमें आज
तज़ी वादियों में करना था काज

 
मन ही मन खुश था मैं
 हो रहा था तैयार ,
क्या लूँ ? क्या लूँ ?
कर रहा था यही विचार

 
जून का महिना था
मौसम था गर्मी का,
सोचते - सोचते यह बात
कट गया रास्ता जर्नी का

 
असली मुश्कील तब आई
जब हो रही थी वर्षा,
डूब रहा था केदारनाथ
पूरा उतराखंड तरसा

 
खबर आया टी.वी.पर
की बाढ़ आई केदारनाथ में,
सौ-सौ लोग मर चुके थे
एक ही रात में
 

ठण्ड से मर रहे थे लोग
कुछ मरे थे भूख से,
तड़प तड़प के आंसू बहाकर
मदद की पुकार दुःख से

 


    जब देखा घर के बाहर
चारो ओर लाशें पड़ी थी,
पानी पानी हर जगह
बचाओ बचाओ शोर चडी थी

 


    दिल्ली मंबई कोलकाता  ने
सुरु किया राहत अभियान,
अभी तो बचाने थे
लाखो लोगो के प्राण

 


    भारतीय सैनिक भी
लग गए थे काम में,
चोबीस घंटे चालू थे
क्योंकी खतरा था आराम में

 


    हमतो सही सलामत
लौट आये थे घर को,
पर उनके लिए दुःख था
जो मरे पल भर को

 


    क्या डरावने दिन थे वो
जब दुःख का आंसू पिया था,
लोगो ने यह सुनके
बस शोक ही किया था

                                       Shaunak Chakraborty